8th Pay Commission New Update: 8वें वेतन आयोग को लेकर एक बार फिर केंद्रीय कर्मचारियों से जुड़ी अहम मांगें सामने आई हैं. इस बार चर्चा का केंद्र बोनस पेमेंट, प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी की मौजूदा सीमाएं हैं. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि जो नियम और सीलिंग सालों पहले तय की गई थीं, वे आज की सैलरी और बढ़ती महंगाई के हिसाब से सही नहीं बैठतीं हैं
खासतौर पर उन कर्मचारियों के लिए समस्या ज्यादा है, जिनकी बेसिक सैलरी ज्यादा है या जिन्होंने लंबी सेवा पूरी की है. मौजूदा व्यवस्था में उन्हें बोनस, PF और ग्रेच्युटी का पूरा लाभ नहीं मिल पाता. इसी वजह से 8th Pay Commission में इन तीनों से जुड़े नियमों में बदलाव की मांग की जा रही है. यह अपडेट इसलिए भी अहम है क्योंकि अभी तक सरकार की तरफ से कोई अंतिम फैसला नहीं आया है, लेकिन कर्मचारी संगठनों ने अपनी मांगें औपचारिक रूप से सरकार तक पहुंचा दी हैं. आने वाले समय में अगर इन पर सहमति बनती है, तो इसका सीधा असर लाखों केंद्रीय कर्मचारियों की कमाई और रिटायरमेंट प्लानिंग पर पड़ सकता है।
इस मुद्दे से वे सभी कर्मचारी प्रभावित हो सकते हैं। जो केंद्र सरकार के अधीन काम कर रहे हैं, खासकर वे लोग जो उच्च वेतनमान में हैं या रिटायरमेंट के करीब हैं. इस लेख में आगे आप समझ पाएंगे कि अभी बोनस, PF और ग्रेच्युटी से जुड़े नियम क्या हैं। कर्मचारी संगठन इनमें क्या बदलाव चाहते हैं और ये मांगें क्यों उठाई जा रही हैं. साथ ही यह भी साफ किया जाएगा कि फिलहाल सरकार की स्थिति क्या है और भविष्य में किस तरह का रास्ता निकल सकता है। जानकारी पूरी तरह तथ्यात्मक रखी गई है ताकि कर्मचारी और उनके परिवार आसानी से स्थिति को समझ सकें।
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बोनस, PF और ग्रेच्युटी की सीमा पर बदलाव की मांग
बता दें कर्मचारी संगठनों का कहना है कि मौजूदा सीमाएं 10 से 15 साल पुराने वेतन ढांचे के हिसाब से तय की गई थीं. उस समय सैलरी और महंगाई दोनों आज के मुकाबले काफी कम थीं. अब बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ता लगातार बढ़ चुका है. ऐसे में पुरानी सीलिंग कर्मचारियों को वास्तविक लाभ नहीं दे पा रही. इसी वजह से इन्हें या तो हटाने या फिर बढ़ाने की मांग की जा रही है.
अभी क्या हैं बोनस से जुड़े नियम
बता दें केंद्र सरकार के कर्मचारियों को आमतौर पर प्रोडक्टिविटी लिंक्ड बोनस या एड-हॉक बोनस दिया जाता है. इसकी गणना एक तय सीमा के आधार पर होती है. इसमें ₹7,000 या न्यूनतम वेतन को आधार माना जाता है और सालाना बोनस भी इसी सीमा तक सीमित रहता है. समस्या यह है कि जिन कर्मचारियों की बेसिक सैलरी इससे काफी ज्यादा है, उन्हें भी बोनस उसी सीमित आधार पर मिलता है.
प्रोविडेंट फंड में मौजूदा व्यवस्था
वर्तमान की बात की जाए तो प्रोविडेंट फंड में कर्मचारी और सरकार दोनों की तरफ से बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते का 12 प्रतिशत योगदान होता है. हालांकि EPF नियमों के तहत ₹15,000 बेसिक सैलरी तक ही अनिवार्य योगदान की सीमा तय है. इससे ऊपर का योगदान वैकल्पिक होता है. ऊंची सैलरी पाने वाले कर्मचारियों के लिए यह व्यवस्था रिटायरमेंट के लिए पर्याप्त फंड तैयार नहीं कर पाती.
ग्रेच्युटी की वर्तमान सीमा
वर्तमान में ग्रेच्युटी सीमा की बात की जाए तो मौजूदा नियमों के अनुसार ग्रेच्युटी की अधिकतम सीमा ₹20 लाख है. इसके लिए कम से कम 5 साल की सेवा जरूरी होती है. ग्रेच्युटी की गणना तय फॉर्मूले से की जाती है, लेकिन लंबी सेवा और अच्छी सैलरी के बावजूद कई कर्मचारियों की राशि इस सीमा पर पहुंचकर रुक जाती है.
कर्मचारी संगठनों की मुख्य मांगें
- कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि बोनस की सभी सीमाएं हटाई जाएं
- और बोनस को वास्तविक सैलरी से जोड़ा जाए
- .इसके अलावा PF में ₹15,000 की बेसिक सैलरी सीमा को खत्म कर पूरा बेसिक और DA शामिल किया जाए
- ग्रेच्युटी के मामले में या तो सीमा को बढ़ाकर ₹30 से ₹40 लाख किया जाए
- या फिर इसे पूरी तरह सीमा मुक्त किया जाए.
सरकार ने पहले सीमाएं क्यों तय की थीं
बता दें इन सीमाओं को तय करने का मकसद सरकारी खर्च को नियंत्रण में रखना और सभी कर्मचारियों के लिए एक समान ढांचा बनाए रखना था. साथ ही रिटायरमेंट से जुड़े लाभों में संतुलन बनाए रखना भी एक अहम वजह रही. लेकिन समय के साथ वेतन संरचना और कर्मचारियों की जरूरतें बदल चुकी हैं.
फिलहाल ये सभी प्रस्ताव मांग के स्तर पर हैं और सरकार की तरफ से कोई आधिकारिक मंजूरी नहीं दी गई है. पहले के वेतन आयोगों में भी बदलाव चरणबद्ध तरीके से लागू किए गए थे. ऐसे में संभावना यही है कि अगर इन मांगों पर सहमति बनती है, तो बदलाव धीरे-धीरे किए जाएंगे.

